सुनने में तो यह सटीक लगता है कि अपराधी, अपराधी होता है और उसकी कोई जाति या धर्म नहीं होता लेकिन गहराई से विचार करने पर कुछ और ही लगता है।
अपराधी प्रत्येक जाति और धर्म में पाए जाते हैं जिन्हें प्राय:उसी जाति, समुदाय या धर्म में संरक्षण मिलता है। उदाहरण के रूप में यदि अपराधी को अपराध की दुनिया में कदम रखने पर उनके माता-पिता या निकट सम्बन्धी या जिम्मेदार संस्थाओं रोक ले,तो अपराध में काफी हदतक कमी लाई जा सकती है,क्योंकि अपराधी जब दुर्दान्त हो कर दुनिया छोड़ता है,तो एक ऐसी अनुपयोगी फ़सल छोड़ जाता है,जिसे हरप्रकार की निराई गुड़ाई करने के वावजूद समाप्त कर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है और खरपतवार का यह अंकुर चरम सीमा पर खेत में फैलकर खेत को अनुपयोगी वना देता है,जिसे मिटाने के लिए अथक प्रयास और मसक्कत की जरूरत पड़ती है, समाज के लिए अपराध भी उसी खरपतवार की तरह ही है।
अपराध की प्रवृत्ति वचपन, संस्कार या कुछ अप्रत्याशित घटनाओं से ही उत्पन्न होने की संभावना रहती है, इस लिए समाज में किसी भी प्रकार की विषमता का कोई भी स्थान नहीं होना चाहिए और इसके लिए किसी सबूत अथवा साक्ष्य की कोई गुंजाइश भी ठीक उसी प्रकार नहीं होनी चाहिए,जिसप्रकार न्यायिक संस्थाऐ "नोटा" को एक प्रत्याशी के समकक्ष मानकर वोट डालने या "रामलला" को अयोध्या में बिराजमान मानने की कल्पना के आधार पर फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं। हमारा संविधान भी न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत की और हमारा ध्यान हरवक्त आकर्षित करता रहता है, संम्राट अशोक का शासन काल स्थापित करने की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।
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